दिल्ली की आम आदमी पार्टी की विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना से जुड़े वायरल वीडियो विवाद में कोर्ट से बड़ा अपडेट सामने आया है। पंजाब के जालंधर स्थित अदालत ने इस मामले में अहम आदेश जारी करते हुए कहा है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी।
बीजेपी सिख समाज और गुरुओं से नफ़रत करती है, और आज भी इन्होंने गुरुओं का अपमान करते हुए एक घिनौनी हरकत की है।
बीजेपी ने गुरु तेग़ बहादुर जी के नाम को ग़लत तरीक़े से इस्तेमाल किया और गुरु साहब का अपमान किया। उन्होंने एक वीडियो ट्वीट किया जिसमे गुरु साहब के बारे में दो झूठ कहे है:… pic.twitter.com/uTCqOosomf
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए माना कि वायरल किया गया वीडियो एडिटेड था। कोर्ट ने इस आधार पर सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को निर्देश दिया कि संबंधित वीडियो को तुरंत हटाया जाए और जिन अकाउंट्स के जरिए इसे साझा किया गया है, उनसे जुड़े लिंक भी डिलीट किए जाएं। आप आदमी पार्टी ने सोशल मीडिया X पर ये ट्वीट किया है जो की अब वायरल हो रहा है!
अदालत ने साफ कहा कि गलत और तोड़-मरोड़ कर पेश की गई सामग्री का प्रसार किसी की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए सभी प्लेटफॉर्म से इसे पूरी तरह हटाना जरूरी है।
इस मामले में आतिशी के खिलाफ जालंधर में दर्ज FIR भी चर्चा में रही, लेकिन शिकायतकर्ता के सामने न आने के कारण जांच आगे नहीं बढ़ सकी। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक शिकायतकर्ता का नाम इक़बाल सिंह बग्गा बताया गया, जो जालंधर के मिडू बस्ती इलाके का निवासी है। हालांकि, FIR में दर्ज पते में प्लेट नंबर का उल्लेख न होने के कारण शिकायतकर्ता की पहचान की पुष्टि नहीं हो सकी।
गौरतलब है कि आतिशी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने दिल्ली विधानसभा की एक बहस के दौरान सिख गुरुओं को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसके बाद यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और विवाद खड़ा हो गया।
अब कोर्ट के आदेश के बाद यह मामला एक बार फिर नए सिरे से चर्चा में आ गया है और सोशल मीडिया पर फैलाए गए कंटेंट की सत्यता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
BJP का फर्ज़ीवाड़ा कोर्ट में साबित हो गया फ़र्ज़ी🚨
जालंधर कोर्ट से आए फ़ैसले में साबित हो गया है कि कपिल मिश्रा ने श्री गुरु तेग बहादुर जी को लेकर फ़र्ज़ी वीडियो शेयर किया था।
इस फ़ैसले के बाद कपिल मिश्रा और मनजिंदर सिंह सिरसा को बर्खास्त कर देना चाहिए और सिरसा जी को अकाल… pic.twitter.com/ocTWMQp61m
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जनहित याचिकाओं (PIL) के दुरुपयोग को लेकर कड़ा रुख देखने को मिला। बिहार चुनाव से जुड़ी एक PIL पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील को कड़ी फटकार लगाई और साफ शब्दों में कहा कि अदालत को केवल पब्लिसिटी पाने का मंच नहीं बनाया जा सकता।
सुनवाई के दौरान जैसे ही संबंधित वकील अदालत में पेश हुआ, CJI ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायपालिका का समय बर्बाद करती हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि बिना ठोस आधार के दाखिल की गई याचिकाएं न तो जनहित में होती हैं और न ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करती हैं।
CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता की मंशा पर सवाल उठाते हुए आदेश दिया कि वह पिछले पांच वर्षों के अपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) का पूरा ब्योरा अदालत में पेश करे। अदालत का संकेत साफ था कि अगर याचिका केवल प्रचार के उद्देश्य से दाखिल की गई पाई गई, तो उस पर भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव जैसी संवेदनशील लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अनावश्यक हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा। पीठ के अनुसार, हाल के वर्षों में PIL का दायरा जनहित से हटकर व्यक्तिगत लोकप्रियता और राजनीतिक एजेंडे का साधन बनता जा रहा है, जो बेहद चिंताजनक है।
लीगल एक्सपर्ट्स का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त रुख उन लोगों के लिए चेतावनी है जो बिना पुख्ता तथ्यों के अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि भविष्य में इस तरह की निराधार और फालतू जनहित याचिकाओं पर कड़ा आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।फ़िलहाल इस ख़बर पर आपकी क्या राय है कमेंट जरूर करें!
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं। समाजवादी पार्टी करीब एक दशक से सत्ता से बाहर है, वहीं बहुजन समाज पार्टी के लिए भी यूपी में सरकार बनाना लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। ऐसे में भाजपा को सत्ता से चुनौती देने के लिए विपक्षी दल अपने-अपने सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में जुट गए हैं।
बसपा प्रमुख मायावती ने गुरुवार को अपना 70वां जन्मदिन मनाया, लेकिन यह आयोजन सिर्फ औपचारिक नहीं रहा। राजनीतिक संकेतों से भरे इस मौके पर मायावती ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सत्ता में वापसी की पूरी कोशिश करेगी।
दलितों के साथ-साथ अपर कास्ट पर फोकस
अब तक मायावती की राजनीति का आधार दलित वोट बैंक माना जाता रहा है, लेकिन हालिया बयानों और रणनीति से संकेत मिल रहा है कि बसपा अब अपर कास्ट मतदाताओं की ओर भी सक्रिय रूप से देख रही है। इस दौरान मायावती ने ब्राह्मण समाज का विशेष रूप से उल्लेख किया और कहा कि बसपा सरकारों में सभी वर्गों को सम्मान मिला है।
लखनऊ स्थित बसपा प्रदेश कार्यालय में मीडिया को संबोधित करते हुए मायावती ने भाजपा के ब्राह्मण विधायकों की हालिया बैठकों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि शीतकालीन सत्र के दौरान भाजपा और कांग्रेस के कई विधायक अपनी उपेक्षा से नाराज़ नजर आए थे, जबकि बसपा ने हमेशा ब्राह्मणों को सत्ता और संगठन में भागीदारी दी है।
“हमारी सरकार में ब्राह्मणों का सम्मान हुआ”
मायावती ने दावा किया कि योगी आदित्यनाथ सरकार में ब्राह्मण समाज की स्थिति मजबूत नहीं है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों को किसी पार्टी की बैसाखी बनने की जरूरत नहीं है और बसपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसने सभी जातियों और धर्मों को बराबरी का सम्मान दिया है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि बसपा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समाज के हितों का भी पूरा ध्यान रखेगी।
2007 का फॉर्मूला फिर चर्चा में
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मायावती एक बार फिर 2007 के उस सामाजिक समीकरण को दोहराने की कोशिश कर रही हैं, जिसने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया था। उस चुनाव में बसपा को 206 सीटें मिली थीं और बड़ी संख्या में ब्राह्मण वोट पार्टी के पक्ष में आए थे। मुस्लिम समर्थन मिलने से बसपा का वोट बैंक और मजबूत हुआ था।
उस दौर में ब्राह्मण नेता सतीश चंद्र मिश्र को संगठन और सरकार में अहम भूमिका दी गई थी, जिससे बसपा लंबे समय तक राज्य की राजनीति में प्रभावशाली बनी रही।
मुस्लिम वोट भी अहम कड़ी
मायावती जानती हैं कि भाजपा को सत्ता से चुनौती देने के लिए दलित और ब्राह्मण के साथ-साथ मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन भी जरूरी है। हाल के चुनावी आंकड़े बताते हैं कि कई राज्यों में मुस्लिम वोट भाजपा के खिलाफ निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं।
ऐसे में अगर बसपा विपक्षी दलों के साथ किसी संभावित गठबंधन में उतरती है और मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा अपनी ओर खींच पाती है, तो इसका सीधा फायदा पार्टी को मिल सकता है। हालांकि मायावती ने साफ किया है कि किसी भी गठबंधन पर फैसला तभी होगा, जब वोट ट्रांसफर की पूरी गारंटी मिलेगी।
भाजपा के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मायावती का अपर कास्ट वोटों पर फोकस भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। पिछले कुछ चुनावों में अपर कास्ट मतदाता भाजपा के साथ मजबूती से जुड़े रहे हैं और केंद्र व राज्य में भाजपा सरकार बनने में उनकी अहम भूमिका रही है।
ऐसे में अगर अपर कास्ट का एक हिस्सा भी भाजपा से अलग होता है, तो यूपी में सत्ताधारी पार्टी की राह मुश्किल हो सकती है। मायावती द्वारा ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के नारे को फिर से मजबूती से उठाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, मायावती का यह राजनीतिक दांव यूपी की चुनावी लड़ाई को और दिलचस्प बना सकता है, जहां आने वाले महीनों में जातीय और सामाजिक समीकरणों की नई तस्वीर उभरती नजर आ सकती है।