दिल्ली की आम आदमी पार्टी की विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना से जुड़े वायरल वीडियो विवाद में कोर्ट से बड़ा अपडेट सामने आया है। पंजाब के जालंधर स्थित अदालत ने इस मामले में अहम आदेश जारी करते हुए कहा है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी।
बीजेपी सिख समाज और गुरुओं से नफ़रत करती है, और आज भी इन्होंने गुरुओं का अपमान करते हुए एक घिनौनी हरकत की है।
बीजेपी ने गुरु तेग़ बहादुर जी के नाम को ग़लत तरीक़े से इस्तेमाल किया और गुरु साहब का अपमान किया। उन्होंने एक वीडियो ट्वीट किया जिसमे गुरु साहब के बारे में दो झूठ कहे है:… pic.twitter.com/uTCqOosomf
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए माना कि वायरल किया गया वीडियो एडिटेड था। कोर्ट ने इस आधार पर सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को निर्देश दिया कि संबंधित वीडियो को तुरंत हटाया जाए और जिन अकाउंट्स के जरिए इसे साझा किया गया है, उनसे जुड़े लिंक भी डिलीट किए जाएं। आप आदमी पार्टी ने सोशल मीडिया X पर ये ट्वीट किया है जो की अब वायरल हो रहा है!
अदालत ने साफ कहा कि गलत और तोड़-मरोड़ कर पेश की गई सामग्री का प्रसार किसी की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए सभी प्लेटफॉर्म से इसे पूरी तरह हटाना जरूरी है।
इस मामले में आतिशी के खिलाफ जालंधर में दर्ज FIR भी चर्चा में रही, लेकिन शिकायतकर्ता के सामने न आने के कारण जांच आगे नहीं बढ़ सकी। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक शिकायतकर्ता का नाम इक़बाल सिंह बग्गा बताया गया, जो जालंधर के मिडू बस्ती इलाके का निवासी है। हालांकि, FIR में दर्ज पते में प्लेट नंबर का उल्लेख न होने के कारण शिकायतकर्ता की पहचान की पुष्टि नहीं हो सकी।
गौरतलब है कि आतिशी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने दिल्ली विधानसभा की एक बहस के दौरान सिख गुरुओं को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसके बाद यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और विवाद खड़ा हो गया।
अब कोर्ट के आदेश के बाद यह मामला एक बार फिर नए सिरे से चर्चा में आ गया है और सोशल मीडिया पर फैलाए गए कंटेंट की सत्यता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
BJP का फर्ज़ीवाड़ा कोर्ट में साबित हो गया फ़र्ज़ी🚨
जालंधर कोर्ट से आए फ़ैसले में साबित हो गया है कि कपिल मिश्रा ने श्री गुरु तेग बहादुर जी को लेकर फ़र्ज़ी वीडियो शेयर किया था।
इस फ़ैसले के बाद कपिल मिश्रा और मनजिंदर सिंह सिरसा को बर्खास्त कर देना चाहिए और सिरसा जी को अकाल… pic.twitter.com/ocTWMQp61m
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जनहित याचिकाओं (PIL) के दुरुपयोग को लेकर कड़ा रुख देखने को मिला। बिहार चुनाव से जुड़ी एक PIL पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील को कड़ी फटकार लगाई और साफ शब्दों में कहा कि अदालत को केवल पब्लिसिटी पाने का मंच नहीं बनाया जा सकता।
सुनवाई के दौरान जैसे ही संबंधित वकील अदालत में पेश हुआ, CJI ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायपालिका का समय बर्बाद करती हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि बिना ठोस आधार के दाखिल की गई याचिकाएं न तो जनहित में होती हैं और न ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करती हैं।
CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता की मंशा पर सवाल उठाते हुए आदेश दिया कि वह पिछले पांच वर्षों के अपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) का पूरा ब्योरा अदालत में पेश करे। अदालत का संकेत साफ था कि अगर याचिका केवल प्रचार के उद्देश्य से दाखिल की गई पाई गई, तो उस पर भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव जैसी संवेदनशील लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अनावश्यक हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा। पीठ के अनुसार, हाल के वर्षों में PIL का दायरा जनहित से हटकर व्यक्तिगत लोकप्रियता और राजनीतिक एजेंडे का साधन बनता जा रहा है, जो बेहद चिंताजनक है।
लीगल एक्सपर्ट्स का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त रुख उन लोगों के लिए चेतावनी है जो बिना पुख्ता तथ्यों के अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि भविष्य में इस तरह की निराधार और फालतू जनहित याचिकाओं पर कड़ा आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।फ़िलहाल इस ख़बर पर आपकी क्या राय है कमेंट जरूर करें!
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं। समाजवादी पार्टी करीब एक दशक से सत्ता से बाहर है, वहीं बहुजन समाज पार्टी के लिए भी यूपी में सरकार बनाना लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। ऐसे में भाजपा को सत्ता से चुनौती देने के लिए विपक्षी दल अपने-अपने सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में जुट गए हैं।
बसपा प्रमुख मायावती ने गुरुवार को अपना 70वां जन्मदिन मनाया, लेकिन यह आयोजन सिर्फ औपचारिक नहीं रहा। राजनीतिक संकेतों से भरे इस मौके पर मायावती ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सत्ता में वापसी की पूरी कोशिश करेगी।
दलितों के साथ-साथ अपर कास्ट पर फोकस
अब तक मायावती की राजनीति का आधार दलित वोट बैंक माना जाता रहा है, लेकिन हालिया बयानों और रणनीति से संकेत मिल रहा है कि बसपा अब अपर कास्ट मतदाताओं की ओर भी सक्रिय रूप से देख रही है। इस दौरान मायावती ने ब्राह्मण समाज का विशेष रूप से उल्लेख किया और कहा कि बसपा सरकारों में सभी वर्गों को सम्मान मिला है।
लखनऊ स्थित बसपा प्रदेश कार्यालय में मीडिया को संबोधित करते हुए मायावती ने भाजपा के ब्राह्मण विधायकों की हालिया बैठकों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि शीतकालीन सत्र के दौरान भाजपा और कांग्रेस के कई विधायक अपनी उपेक्षा से नाराज़ नजर आए थे, जबकि बसपा ने हमेशा ब्राह्मणों को सत्ता और संगठन में भागीदारी दी है।
“हमारी सरकार में ब्राह्मणों का सम्मान हुआ”
मायावती ने दावा किया कि योगी आदित्यनाथ सरकार में ब्राह्मण समाज की स्थिति मजबूत नहीं है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों को किसी पार्टी की बैसाखी बनने की जरूरत नहीं है और बसपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसने सभी जातियों और धर्मों को बराबरी का सम्मान दिया है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि बसपा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समाज के हितों का भी पूरा ध्यान रखेगी।
2007 का फॉर्मूला फिर चर्चा में
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मायावती एक बार फिर 2007 के उस सामाजिक समीकरण को दोहराने की कोशिश कर रही हैं, जिसने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया था। उस चुनाव में बसपा को 206 सीटें मिली थीं और बड़ी संख्या में ब्राह्मण वोट पार्टी के पक्ष में आए थे। मुस्लिम समर्थन मिलने से बसपा का वोट बैंक और मजबूत हुआ था।
उस दौर में ब्राह्मण नेता सतीश चंद्र मिश्र को संगठन और सरकार में अहम भूमिका दी गई थी, जिससे बसपा लंबे समय तक राज्य की राजनीति में प्रभावशाली बनी रही।
मुस्लिम वोट भी अहम कड़ी
मायावती जानती हैं कि भाजपा को सत्ता से चुनौती देने के लिए दलित और ब्राह्मण के साथ-साथ मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन भी जरूरी है। हाल के चुनावी आंकड़े बताते हैं कि कई राज्यों में मुस्लिम वोट भाजपा के खिलाफ निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं।
ऐसे में अगर बसपा विपक्षी दलों के साथ किसी संभावित गठबंधन में उतरती है और मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा अपनी ओर खींच पाती है, तो इसका सीधा फायदा पार्टी को मिल सकता है। हालांकि मायावती ने साफ किया है कि किसी भी गठबंधन पर फैसला तभी होगा, जब वोट ट्रांसफर की पूरी गारंटी मिलेगी।
भाजपा के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मायावती का अपर कास्ट वोटों पर फोकस भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। पिछले कुछ चुनावों में अपर कास्ट मतदाता भाजपा के साथ मजबूती से जुड़े रहे हैं और केंद्र व राज्य में भाजपा सरकार बनने में उनकी अहम भूमिका रही है।
ऐसे में अगर अपर कास्ट का एक हिस्सा भी भाजपा से अलग होता है, तो यूपी में सत्ताधारी पार्टी की राह मुश्किल हो सकती है। मायावती द्वारा ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के नारे को फिर से मजबूती से उठाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, मायावती का यह राजनीतिक दांव यूपी की चुनावी लड़ाई को और दिलचस्प बना सकता है, जहां आने वाले महीनों में जातीय और सामाजिक समीकरणों की नई तस्वीर उभरती नजर आ सकती है।
संक्षेप: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से कराने की सिफारिश की है। उन्होंने बताया कि पीड़िता के माता-पिता की मांग और भावनाओं का सम्मान करते हुए यह निर्णय लिया गया है।
लंबे समय से चले आ रहे विरोध-प्रदर्शनों और जनदबाव के बीच उत्तराखंड सरकार ने बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। शुक्रवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि अंकिता के माता-पिता से बातचीत के बाद सरकार ने यह फैसला लिया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि पीड़ित परिवार की मांग को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार इस मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच के लिए सीबीआई जांच की सिफारिश कर रही है।
क्या है पूरा मामला
अंकिता भंडारी पौड़ी जिले के एक निजी रिसॉर्ट में कार्यरत थीं। आरोप है कि रिसॉर्ट में एक विशेष व्यक्ति को “विशेष सेवा” देने का दबाव उन पर बनाया गया था। जब अंकिता ने इसका विरोध किया, तो उनकी हत्या कर दी गई।
निचली अदालत ने इस मामले में रिसॉर्ट मालिक समेत तीन आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, हाल ही में सामने आए एक ऑडियो क्लिप में किसी कथित VIP के शामिल होने के दावों ने इस मामले को एक बार फिर चर्चा में ला दिया।
ऑडियो क्लिप के बाद बढ़ा विवाद
सोशल मीडिया पर वायरल हुए ऑडियो के बाद राज्य में कई जगह धरना-प्रदर्शन शुरू हो गए। लोग इस मामले की निष्पक्ष जांच और कथित प्रभावशाली लोगों की भूमिका सामने लाने की मांग करने लगे।
सरकार का पक्ष
मुख्यमंत्री धामी ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा कि घटना की जानकारी मिलते ही सरकार ने बिना किसी भेदभाव के त्वरित कार्रवाई की। उन्होंने बताया कि एक महिला आईपीएस अधिकारी की अगुवाई में SIT गठित की गई, सभी आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी हुई और मामले की मजबूत पैरवी की गई, जिसके चलते किसी भी आरोपी को जमानत नहीं मिल सकी।
SIT जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, जो यह दर्शाता है कि सरकार ने शुरू से अंत तक पारदर्शिता और सख्ती के साथ कार्रवाई की।
अलग-अलग FIR और आगे की जांच
मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि हाल में वायरल हुए ऑडियो क्लिप को लेकर अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई हैं और उनकी जांच जारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने राजनीतिक उद्देश्य से भ्रम फैलाने और प्रदेश में अशांति पैदा करने की कोशिश की।
धामी ने कहा कि सरकार का दायित्व है कि जनता को गुमराह करने वाली गतिविधियों पर रोक लगे और पीड़ित परिवार को न्याय मिले। इसी भावना के तहत अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपने की सिफारिश की गई है।
उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया के बाद जारी की गई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने सियासी हलकों में हलचल बढ़ा दी है। इस प्रक्रिया के तहत राज्य में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। ड्राफ्ट आंकड़ों के मुताबिक यूपी में करीब तीन करोड़ वोटरों के नाम कटे हैं, जो बिहार की तुलना में कहीं अधिक बताए जा रहे हैं।
निर्वाचन आयोग की ओर से स्पष्ट किया गया है कि ड्राफ्ट सूची में जिन मतदाताओं के नाम शामिल नहीं किए गए हैं, उन्हें अपनी आपत्तियां दर्ज कराने का पूरा अवसर दिया जाएगा। आयोग के अनुसार, 12 मार्च तक अंतिम मतदाता सूची जारी की जाएगी, जबकि उससे पहले आपत्तियों और दावों का निपटारा किया जाएगा।
लोक भवन में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि SIR अभियान के दौरान लगभग 15.44 करोड़ मतदाताओं का सत्यापन किया गया। इनमें से करीब 2.89 करोड़ नाम विभिन्न कारणों से ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं किए गए हैं। हटाए गए नामों में मृत मतदाता, स्थायी रूप से स्थानांतरित लोग और डुप्लीकेट एंट्री शामिल हैं।
आंकड़ों के अनुसार, ड्राफ्ट सूची से बाहर किए गए मतदाताओं में लगभग 46 लाख मृत, 2.17 करोड़ स्थानांतरित और करीब 25 लाख डुप्लीकेट नाम पाए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि जिन मतदाताओं के नाम गलती से हटे हैं, वे निर्धारित समयसीमा के भीतर दावा प्रस्तुत कर सकते हैं।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने यह भी बताया कि राज्य में सबसे अधिक नाम राजधानी लखनऊ में काटे गए हैं। इसके अलावा प्रयागराज, कानपुर नगर, आगरा, गाजियाबाद, बरेली, मेरठ, शाहजहांपुर और जौनपुर जैसे जिलों में भी बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए हैं।
निर्वाचन आयोग के मुताबिक अब तक बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस भेजे जा चुके हैं और फॉर्म-6, 7 और 8 के माध्यम से दावे व आपत्तियां ली जा रही हैं। आयोग ने भरोसा दिलाया है कि सभी शिकायतों की निष्पक्ष जांच के बाद अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन किया जाएगा, ताकि किसी भी पात्र मतदाता का अधिकार प्रभावित न हो।
बांग्लादेश में आम चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल लगातार अस्थिर होता जा रहा है। जमात-ए-इस्लामी ने दावा किया है कि देश में इस समय निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराना संभव नहीं है। पार्टी का आरोप है कि मौजूदा हालात में सत्ता पक्ष एक विशेष राजनीतिक दल को बढ़त दिलाने की कोशिश कर रहा है।
जमात-ए-इस्लामी की केंद्रीय कार्यकारिणी की हालिया बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया कि फरवरी में होने वाले संसदीय चुनाव से पहले राजनीतिक परिस्थितियों की गहन समीक्षा की गई है। पार्टी का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है, जिससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है।
बयान में यह भी उल्लेख किया गया कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद अंतरिम सरकार के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को अगली सरकार के सबसे मजबूत दावेदार के रूप में देखा जा रहा है। गौरतलब है कि 2001 से 2006 के बीच जमात-ए-इस्लामी, बीएनपी के साथ गठबंधन सरकार का हिस्सा रही थी और आगामी चुनावों में एक बार फिर बीएनपी की प्रमुख सहयोगी मानी जा रही है।
पार्टी प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह भी कहा गया कि जमात को देश के विभिन्न हिस्सों से शिकायतें मिली हैं, जिनमें आरोप लगाए गए हैं कि कुछ सरकारी अधिकारी खुले तौर पर एक खास राजनीतिक दल के पक्ष में काम कर रहे हैं। जमात नेताओं ने हाल के महीनों में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों पर भी चिंता जताई।
इसके साथ ही जमात-ए-इस्लामी ने चुनाव आयोग और कानून-व्यवस्था से जुड़े संस्थानों से अपील की है कि वे अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करें, ताकि देश में निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और विश्वसनीय चुनाव सुनिश्चित किए जा सकें।
संक्षेप: उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के नागरिकों तक सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे और पारदर्शी तरीके से पहुंचाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। मुख्य सचिव मनोज आलोक कुमार के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकार की कुल 98 जनकल्याणकारी योजनाओं को अब फैमिली आईडी से जोड़ा जा चुका है। इस व्यवस्था से प्रदेश के 15 करोड़ 7 लाख से अधिक लोगों को सीधा लाभ मिल रहा है।
अब कोई भी व्यक्ति योजनाओं से वंचित नहीं रहेगा
योगी सरकार का कहना है कि प्रदेश में अब कोई भी पात्र व्यक्ति सरकारी योजनाओं से बाहर नहीं रहेगा। चाहे राशन कार्ड हो या अन्य किसी योजना का लाभ—फैमिली आईडी के जरिए जरूरतमंदों को सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। आय प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेज बनवाने की प्रक्रिया भी अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सरल कर दी गई है।
फैमिली आईडी से जुड़ी 98 योजनाएं
सरकार के मुताबिक, फैमिली आईडी प्रणाली के तहत केंद्र और यूपी सरकार की 98 योजनाओं को एक प्लेटफॉर्म पर जोड़ा गया है। इसका फायदा यह हुआ है कि अब लाभार्थियों को अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। फैमिली आईडी में एक परिवार की पूरी जानकारी दर्ज होती है, जिससे योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक तेजी से और पारदर्शिता के साथ पहुंच रहा है।
12 अंकों की फैमिली आईडी बनी योजनाओं की चाबी
फैमिली आईडी कार्ड 12 अंकों की एक विशिष्ट पहचान संख्या होती है, जिसमें परिवार के सभी सदस्यों का विवरण शामिल रहता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा के अनुरूप इस व्यवस्था का उद्देश्य “एक परिवार–एक पहचान” के सिद्धांत को लागू करना है, ताकि पात्रता के आधार पर योजनाओं का स्वतः चयन हो सके और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सके।
दस्तावेज़ों के लिए राहत, समय और पैसे की बचत
फैमिली आईडी लागू होने से नागरिकों को आय, जाति और निवास जैसे प्रमाण पत्र बनवाने के लिए अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ रहे हैं। एक बार पंजीकरण होने के बाद जरूरी जानकारी सरकारी सिस्टम में स्वतः उपलब्ध हो जाती है, जिससे लोगों का समय और श्रम दोनों बच रहे हैं।
राशन कार्ड से वंचित परिवारों को भी मिलेगा फायदा
योगी सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि जो परिवार किसी कारणवश राशन कार्ड से वंचित हैं, उन्हें भी फैमिली आईडी के माध्यम से सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाएगा। इसके लिए विशेष पंजीकरण अभियान चलाया जा रहा है, ताकि कोई भी जरूरतमंद परिवार सरकारी सहायता से बाहर न रहे।
आधार और मोबाइल लिंक अनिवार्य
फैमिली आईडी बनवाने के लिए परिवार के सभी सदस्यों का आधार नंबर जरूरी है। साथ ही आधार से मोबाइल नंबर लिंक होना अनिवार्य किया गया है, ताकि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए लाभार्थियों तक सहायता राशि सीधे पहुंचाई जा सके। यदि किसी लाभार्थी का मोबाइल नंबर बदल गया है, तो उसे आधार से नया नंबर अपडेट कराना होगा।
संक्षेप: पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनावी माहौल के बीच बड़ा बदलाव देखने को मिला है। तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद मोसम नूर ने कांग्रेस में वापसी कर ली है। मालदा के प्रभावशाली खान चौधरी परिवार से जुड़ी मोसम नूर के इस कदम को टीएमसी के लिए नुकसान और कांग्रेस के लिए संगठनात्मक मजबूती के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इससे राज्य के राजनीतिक समीकरणों पर असर पड़ सकता है।
पश्चिम बंगाल की सियासत में विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक फेरबदल देखने को मिला है। तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद बंजरी तुरे ने कांग्रेस में वापसी कर ली है, जिससे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी को राजनीतिक झटका लगा है। बंजरी तुरे का कांग्रेस में लौटना खास तौर पर मालदा और मुस्लिम बहुल इलाकों में कांग्रेस की स्थिति को मजबूत कर सकता है।
दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान बंजरी तुरे ने वरिष्ठ नेता जयराम रमेश, पश्चिम बंगाल प्रभारी गुलाम अहमद मीर और प्रदेश अध्यक्ष शुभंकर सरकार की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली। बताया जा रहा है कि उनका राज्यसभा कार्यकाल अप्रैल में समाप्त हो रहा है और वे आगामी विधानसभा चुनाव में सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं।
गौरतलब है कि बंजरी तुरे 2009 से 2019 तक कांग्रेस के टिकट पर मालदा से दो बार लोकसभा सांसद रह चुकी हैं। 2019 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा, लेकिन लोकसभा चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद 2020 में टीएमसी ने उन्हें राज्यसभा भेजा था।
खान चौधरी परिवार से ताल्लुक रखने वाली बंजरी तुरे की वापसी को कांग्रेस नेतृत्व अहम मान रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि इससे बंगाल में संगठन को नई ऊर्जा मिलेगी और कांग्रेस एक बार फिर राज्य की राजनीति में मजबूती से खड़ी होगी।